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पुराना रेडियो, बारिश की सोंधी खुशबू और सुकून के चंद पल

रविवार की एक शांत शाम। खिड़की के बाहर मुंबई की सड़कें रोज़ की तुलना में थोड़ी शांत थीं। हवा में अचानक एक ठंडक आ गई थी और आसमान में काले बादलों ने डेरा जमा लिया था। कुछ ही मिनटों में, बारिश की पहली बूंदें सूखी मिट्टी पर गिरीं, और वह चिर-परिचित, सोंधी सी खुशबू पूरे घर में फैल गई जिसे हम ‘सोंधी महक’ कहते हैं।

दौड़ती-भागती ज़िंदगी में अक्सर हम भूल जाते हैं कि रुकना कैसा होता है। लेकिन उस शाम, बारिश की आवाज़ ने जैसे समय को कुछ देर के लिए रोक दिया था।

अलमारी की सफाई करते हुए, मुझे एक कोने में दादाजी का पुराना लकड़ी का ट्रांजिस्टर रेडियो मिला। उस पर थोड़ी धूल जमी थी। मैंने उसे साफ किया और धीरे से उसका नॉब घुमाया।

शुरुआत में थोड़ी सी सरसराहट (static) की आवाज़ आई, लेकिन जैसे ही मैंने ट्यूनर को थोड़ा और हिलाया, रेडियो स्टेशन पर एक पुराना, धीमा गीत बजने लगा: ‘आने वाला पल जाने वाला है…’

उस पुराने गाने की आवाज़ और खिड़की पर गिरती बारिश की बूंदों का तालमेल कुछ ऐसा था जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। मैंने गैस पर अदरक और इलायची वाली चाय चढ़ाई। पानी खौलने लगा और चाय की खुशबू बारिश की सोंधी महक के साथ घुल-मिल गई।

बालकनी में एक छोटी सी कुर्सी डालकर बैठना, हाथ में गरम चाय का कप होना, और सामने गिरती बारिश की बूंदों को देखना—उस पल में न कोई ईमेल का जवाब देना था, न किसी प्रोजेक्ट की डेडलाइन थी और न ही भविष्य की कोई चिंता।

हम सब ज़िंदगी में बड़ी-बड़ी खुशियाँ ढूंढते हैं—एक अच्छी नौकरी, बड़ा घर, महँगी गाड़ियाँ। लेकिन सच तो यह है कि असली ‘सुकून’ (peace) बहुत छोटी-छोटी चीज़ों में छिपा होता है:

  • बारिश के बाद पत्तों पर चमकती पानी की बूंदों को देखने में।
  • एक पुराने गाने को बिना किसी जल्दबाजी के पूरा सुनने में।
  • किसी अपने के साथ बैठकर बिना किसी मतलब के चुपचाप चाय पीने में।

उस शाम मुझे समझ आया कि ज़िंदगी को जीने के लिए हमेशा दौड़ना ज़रूरी नहीं है। कभी-कभी, बस थम जाना और इस पल को महसूस करना ही काफी होता है।

आने वाला पल तो चला जाएगा, लेकिन उस सुकून भरे पल की याद हमारे दिल में हमेशा रह जाएगी।..

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