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बिल्हौर की गलियां, एक ट्रेन का सफर और बचपन की अधूरी तलाश

Last updated on August 26, 2026

कानपुर की भागदौड़, बिल्हौर की गलियां और मेरी कोडिंग की उलझनों के बीच, ज़िंदगी एक सेट पैटर्न पर चल रही थी। स्क्रीन पर दौड़ते कोड्स और क्लाइंट्स के प्रोजेक्ट्स ने मुझे इतना व्यस्त कर दिया था कि पीछे छूट गई चीज़ों को मुड़कर देखने का वक्त ही नहीं मिलता था। लेकिन फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ, जिसने मुझे मेरे बचपन से दोबारा मिलवा दिया।

बिल्हौर की गलियां और बचपन की यादें

बात उस वक्त की है जब हम चौथी क्लास (Class 4) में हुआ करते थे। मेरी दुनिया मेरे चार दोस्तों— हनी, अमान, हर्ष और अनिरुद्ध के इर्द-गिर्द घूमती थी। हम पाँचों की वो गहरी दोस्ती स्कूल की उन पुरानी बेंचों से शुरू हुई थी। हम पाँचों बिल्कुल अलग थे, लेकिन शायद इसीलिए हमारी दोस्ती इतनी पक्की थी।

अगर आप हमारी क्लास में आते, तो आपको हमारी ‘पलटन’ बड़ी आसानी से पहचान में आ जाती:

बिल्हौर की गलियां

हनी — हमारा सबसे खुशमिजाज दोस्त। उसकी हँसी इतनी प्यारी थी कि उसे देखकर कोई भी मुस्कुरा दे। क्या बच्चे, क्या टीचर्स… पूरी क्लास और सारे टीचर्स उसे बहुत प्यार करते थे। वो किसी भी उदास माहौल को पल भर में खुशनुमा बना देता था।

हर्ष — हमारी पलटन का सबसे सुलझा हुआ और ‘Deep Thinker’ (गहराई से सोचने वाला) लड़का। उसे अगर कोई काम दे दिया जाए, तो वो उसमें कोई गड़बड़ी नहीं होने देता था। अगर होमवर्क मिला है, तो चाहे कुछ भी हो जाए, वो उसे हर हाल में पूरा करके ही दम लेता था। उसकी यही आदत उसे हम सबसे अलग और ज़िम्मेदार बनाती थी।

अनिरुद्ध — हमारा अपना कहानीकार! उसकी मीठी-मीठी बातें और रोज़ एक नई कहानी सुनाने की आदत हमें हमेशा उसकी तरफ खींचती थी। वो हर दिन एक नया किस्सा लेकर आता था।

अमान — हमारा ऑल-राउंडर! उसे दुनिया की किसी भी बात की कोई टेंशन नहीं होती थी। चाहे कितना भी मुश्किल काम हो, अमान उसे हँसते-खेलते और बड़ी आसानी से पूरा कर देता था। उसकी वो बेफिक्री आज भी मुझे बहुत याद आती है।

और मैं (मंजीत) — मेरी आदत थोड़ी अजीब थी। मैं हमेशा अपना सारा होमवर्क क्लास में ही खत्म कर लेता था, ताकि घर आकर मुझे वो किताबें पढ़नी पड़ें जो टीचर्स अगले दिन पढ़ाने वाले थे। अगर क्लास में कुछ याद करने को कहा जाता, तो मैं उसे घर ले जाने के बजाय वहीं क्लास में ही रट लेता था।

छठी क्लास (Class 6) आते-आते हम सब अलग हो गए। उस वक्त न तो हमारे पास मोबाइल फोन होते थे और न ही सोशल मीडिया। बस स्कूल छूटा, और धीरे-धीरे हम सब एक-दूसरे से पूरी तरह कट गए। कोई कॉन्टैक्ट नंबर नहीं, कोई अता-पता नहीं।

ट्रेन का वो इत्तेफाक और पहली कड़ी सालों बाद, एक दिन मैं ट्रेन से सफर कर रहा था। मेरी बगल वाली सीट पर एक लड़का आकर बैठा। मैं उसे गौर से देख रहा था, चेहरा कुछ जाना-पहचाना सा लग रहा था। दिमाग के किसी कोने में दबी एक धुंधली सी याद ताज़ा हुई। मैंने हिम्मत करके उससे पूछ ही लिया, “क्या आप अमान के बड़े भाई हैं?”

उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा और कहा, “हाँ!”

वो पल मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। मैंने तुरंत उन्हें अपना नाम बताया और उनसे अमान का नंबर ले लिया। अमान अब अलीगढ़ में है । मैंने उसे कॉल किया और जब हमने सालों बाद बात की, तो अमान की वही पुरानी बेफिक्री और हँसी फिर से सुनाई दी। उस एक फोन कॉल ने मेरे अंदर एक ज़िद पैदा कर दी— अब मुझे अपने बाकी दोस्तों को भी ढूँढना था!

बिल्हौर की गलियां और हर्ष से वो मुलाकात अगले ही दिन मैंने तय किया कि मैं बिल्हौर जाऊँगा, जहाँ हर्ष रहा करता था। बिल्हौर की उन्हीं पुरानी गलियों से गुज़रते हुए मैं हर्ष के घर पहुँचा। दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन पता चला कि वो घर पर नहीं है।

मन थोड़ा उदास हो गया। मैं वापस लौट ही रहा था कि रास्ते में अचानक मेरी नज़र एक चेहरे पर पड़ी। वो हर्ष था! इतने सालों बाद, हम सड़क के बीचों-बीच मिले। मुझे देखकर उसकी आँखों में जो खुशी और हैरानी थी, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। उसकी आँखों में वही पुरानी गहराई और ठहराव आज भी था।

मैंने तुरंत हर्ष का नंबर लिया और उसी दिन व्हाट्सएप पर एक ग्रुप बनाया। हमारा बचपन अब डिजिटल दुनिया में फिर से एक हो रहा था।

हनी की वापसी और एक खाली कुर्सी मैंने हर्ष से कहा, “भाई, कैसे भी करके हनी का नंबर निकाल, वो भी तो बिल्हौर में ही था।” और हमेशा की तरह, हर्ष ने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी की। उसने हनी का नंबर ढूँढ निकाला और उसे भी हमारे ग्रुप में ऐड कर लिया।

ग्रुप में आते ही हनी की वही पुरानी खुशी और मज़ाक का सिलसिला फिर से शुरू हो गया। अब हम पाँच में से चार लोग एक साथ थे— मैं (मंजीत) कानपुर में, अमान अलीगढ़ में, और हर्ष और हनी बिल्हौर में।

लेकिन… इस कहानी में अभी एक खालीपन बाकी है। अनिरुद्ध।

हमने हर जगह कोशिश की, लेकिन हमारे उस प्यारे कहानीकार अनिरुद्ध का अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है। 6 साल पहले जो दोस्त अचानक कहीं छूट गया था, उसकी तलाश आज भी जारी है।

शायद किसी दिन, किसी और ट्रेन के सफर में, या कानपुर की किसी और सड़क पर अनिरुद्ध भी अचानक अपनी कोई नई कहानी लेकर टकरा जाए। या शायद, मेरी वेबसाइट का यह ब्लॉग किसी दिन उस तक पहुँच जाए।

तब तक के लिए, हमारी इस कहानी का एक पन्ना खाली है, जिसका हमें आज भी इंतज़ार है।

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