शहर की भागदौड़, डेडलाइन्स और ट्रैफिक के शोर से ऊबकर, मैंने एक दिन अपना बैकपैक उठाया और निकल पड़ा पहाड़ों की ओर। मकसद सिर्फ एक था—खुद के साथ कुछ वक्त बिताना और शांति की तलाश। लेकिन मुझे नहीं पता था कि यह सफर मेरी जिंदगी का सबसे अविश्वसनीय तजुर्बा बनने वाला है।

पहाड़ों का मौसम कितनी जल्दी बदलता है, यह मुझे उस दिन समझ आया। दोपहर ढलते ही अचानक आसमान में काले बादल घिर आए और चारों तरफ घना सफेद कोहरा छा गया। विजिबिलिटी (visibility) लगभग शून्य हो गई थी और सर्द हवाओं के साथ हल्की बारिश भी शुरू हो गई।
वह दिन बहुत अच्छा बीता था, लेकिन जैसे-जैसे शाम ढलनी शुरू हुई, चीज़ें बिगड़ने लगीं। मैं वापसी के लिए नीचे उतर रहा था, लेकिन कुछ ही दूर चलने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं रास्ता भूल चुका हूँ। चारों तरफ सिर्फ ऊंचे पेड़ और अनजान पगडंडियां थीं। मुझे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि मुझे किधर से उतरना है। मेरी परेशानी हर गुज़रते पल के साथ बढ़ती जा रही थी।
तभी अचानक मौसम ने अपना भयंकर रूप ले लिया। आसमान में घने काले बादल छा गए और बादलों की ज़ोरदार गड़गड़ाहट से पूरा जंगल गूंजने लगा। देखते ही देखते बहुत तेज़ बारिश शुरू हो गई।
मैं पिछले एक घंटे से उस घने जंगल में बदहवास सा भटक रहा था। अब तक पूरा अंधेरा हो चुका था और दूर-दूर तक किसी इंसान का नामोनिशान नहीं था। ठंड, थकान और डर ने मुझे पूरी तरह से तोड़ दिया था। मैं अंदर से बहुत हताश और निराश होने लगा था। जब कोई उम्मीद नहीं बची, तो मैंने वहीं खड़े होकर आँखें बंद कीं और सच्चे मन से ईश्वर का स्मरण किया— “हे भगवान, अब आप ही मुझे यहाँ से निकाल सकते हैं।”
जैसे ही मैंने प्रार्थना करके आँखें खोलीं, मेरे सामने एक अचरज कर देने वाला दृश्य था। वहां अचानक से एक साधु बाबा खड़े थे। मैं समझ ही नहीं पाया कि उस घने अंधेरे और तेज़ बारिश में वो अचानक कहाँ से आ गए!
मैं हैरान था। मैं कुछ बोलता या उनसे मदद मांगता, उससे पहले ही उन्होंने बड़ी शांति से अपनी उंगली उठाई और एक दिशा की तरफ इशारा करते हुए कहा, “बेटा, उधर से तुम जा सकते हो।”
मैंने तुरंत राहत की सांस ली और उस रास्ते की तरफ देखा जो उन्होंने उंगली से दिखाया था। जब मैं उन्हें धन्यवाद कहने के लिए वापस उनकी तरफ पलटा… तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वहाँ कोई नहीं था!
वो साधु बाबा महज़ एक-दो सेकंड के अंदर पूरी तरह से गायब हो चुके थे। उस अंधेरे जंगल में मैं एकदम अकेला था। एक पल के लिए मैं अंदर तक डर गया और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
लेकिन अगले ही पल, मेरे मन का सारा डर एक अद्भुत शांति में बदल गया। मुझे गहराई से यह महसूस हुआ कि वो कोई आम इंसान नहीं थे। मेरी हताशा भरी पुकार सुनकर स्वयं ईश्वर मुझे रास्ता दिखाने आए थे। मैंने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया और उनके बताए हुए उस रास्ते पर चल पड़ा।कुछ ही देर में, मैं घने जंगल से बाहर निकल आया और सुरक्षित अपने बेस तक पहुँच गया।
आज भी जब बादल गड़गड़ाते हैं और तेज़ बारिश होती है, तो मुझे वो रात और वो साधु बाबा याद आ जाते हैं। उस दिन मुझे समझ आया कि जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं और इंसान पूरी तरह टूट जाता है, तब ऊपर वाला खुद किसी न किसी रूप में आपका हाथ थामने ज़रूर आता है।

